*कफन*
●●●●●●●
जिगर हमारा नाजुक था कभी
ये इक जमाने की अपनी बात है।
आदमी इन्सानियत खोकर जीने लगा
ये इस जमाने की उसकी आदत है।
पीठ दिखानेवाले अक्सर कोई
बहाना बनाकर छिप जाते है।
साजीशें गँवारा नही होती कभी
जो मुँहपर सरेआम तमाचा मार देते है।
क्या लेके जायेंगे इस जहाँसे
*कफन*तो ओढकर जी लो *इन्सानियत की*।
कमसे कम जिंदगानी अपनी
कबूल फरमायेगी जन्नत के शामयाने की।
✍️©® *अनिता कलसकर*
*कल्याण*
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जिगर हमारा नाजुक था कभी
ये इक जमाने की अपनी बात है।
आदमी इन्सानियत खोकर जीने लगा
ये इस जमाने की उसकी आदत है।
पीठ दिखानेवाले अक्सर कोई
बहाना बनाकर छिप जाते है।
साजीशें गँवारा नही होती कभी
जो मुँहपर सरेआम तमाचा मार देते है।
क्या लेके जायेंगे इस जहाँसे
*कफन*तो ओढकर जी लो *इन्सानियत की*।
कमसे कम जिंदगानी अपनी
कबूल फरमायेगी जन्नत के शामयाने की।
✍️©® *अनिता कलसकर*
*कल्याण*
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